Thursday, October 2, 2014

मोदी, झाडू और गंदगी

      ड्रामा और हकीकत एक सिक्के के दो पहलू हैं।  आज दोनो ही सामने  आ गए। अपने आप को प्रधान सेवक बताने वाले मोदी जी ने सड़क के सूखे पत्ते साफ कर सफाई अभियान की शुरूआत की वहीं खुद को आम आदमी बताने वाले केजरीवाल ने गंदी बजबजाती नालियों को साफ किया। अब ​किसने हकीकत में किया किसने ड्रामा यह तो भगवान जानता है या तो फिर वह खुद। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं की इस सफाई अ​भियान के पीछे स्वार्थ निहित है। कुल मिला कर आज मोदी,झाडू और  गंदगी के बीच कोई रिश्ता नजर नहीं आया।

     
​जिस तरह से मोदी ने सफाई ​अभियान कार्यक्रम को अंजाम दिया वह तो महज एक ढोंग था। पहली बात तो कोई सज—धज कर व नए स्त्री किए हुए कपड़े पहन कर तो अपने घर पर भी झाडू नहीं लगाता,रोड में लगाना तो दूर की बात है। और दूसरी बात मीडिया को हफ्तों पहले से सूचित करना कार्यक्रम को प्री—प्लान्ड ड्रामा बनाता है, आज—कल तो कोई सफाई कर्मचारी भी किसी को बता कर झाडू नहीं लगाने जाता । और तीसरी बात रही मीडिया के समाने व सज धज कर कार से आना और फिर झाडू लगाना,लोगो को तो पड़ोसी भी घर के बाहर झाडू लगाते देख लेते हैं तो वह झेंप जाते हैं। इन सब पर गौर करें तो मालूम चलता है कि मोदी का सफाई अभियान कम ईवेंट ज्यादा था।

    
अगर मोदी को कुछ साफ ही करना था तो पीएम आवास अथवा संसद भवन में एक दिन के लिए सफाई कर्मचारियों की छुट्टी कर देते और थाम लेते झाडू। अगर इतने से भी पेट न भरता तो निकल पड़ते दिल्ली की गलियों में वहां काफी कुछ था साफ करने को। खैर जो हुआ सो हुआ। अभी भी मोदी जी एक काम और कर सकते हैं,रोजाना अपना बेडरूम ही साफ कर लिया करें वही बहुत है। और रही केजरीवाल की बात तो उनके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है,ये पब्लिक है कि सब जानती है। मोदी के इस सफाई अभियान कम ईवेंट के दौरान प्रशंसकों को आटोग्राफ देना कहां तक उ​चित था। भला क्या कोई सफाई वाला आटोग्राफ देता है ? मोदी जी जनता को उल्लू न बनाविंग......

                                                                                                       08109555764/09455879256

Friday, September 26, 2014

मोदी का मंगलराज

मंगलयान की खुशी में बेचारे भारतीय लोट पोट हुए जा रहे हैं। अच्छी बात है खुशी किसको नहीं होती। ऐसा ही कुछ मोदी सरकार के साथ है। मोदी सरकार के रिपोर्ट कार्ड में एक और उपलब्धि जुड़ गई। सरकार खुश तो जनता अपने आप खुश। आखिर यह मंगल यान किसके लिए मंगल है। आपके लिए या हमारे लिए या फिर देश की उस एक चौथाई जनता के लिए जिसे मंगल ग्रह की लाल सतह चूल्हे के अंगारों में नजर आती है। जी हां देश में आज भी एक चौथाई जनता दो वक्त की रोटी की  मोहताज हैं। दिन भर जूझने के बाद शाम  चूल्हे में अंगारे धधके या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। लेकिन मोदी सरकार में मंगल यान की सफलता की पूरी गारंटी थी। बीजेपी के मैनीफेस्टो में यह लिखा था क्या मुझे याद नहीं आ रहा…..

Monday, August 25, 2014

कहीं दूसरी गाजा पट्टी न बन जाए काश्मीर

   भारत-पाक के बीच लगातार बढ़ता तनाव किसी एक के लिए नहीं बल्कि काश्मीर के लिए घातक साबित हो रहा है। बार बार वार्ताओं के विफल दौर से जूझ रहे दोनो देशों में कुशल नेतृत्व व निर्णायक क्षमता का अभाव स्पष्ट झलकता है। ६७ सालों से इन दोनों देशों के बीच सिर्फ और सिर्फ काश्मीर पिस रहा है।
जब-जब इन देशों के बीच आग भड़की है सबसे ज्यादा नुकसान सिर्फ काश्मीर का ही हुआ है। दोनों देशों के बीच भंवर में फंसे काश्मीर को लेकर शांति वार्ता सरीखी हर बात विफल ही रही है। न तो पाक अपनी कही हुई बात पर अडिग रह पाया है न तो भारत जनता से किए गए अपने वादे पर। सेना से मजबूर पाक सरकार ने हर बार भारत को धोखा दिया है। बंद कमरे में भले ही पाक ने भारत से शांति वार्ता के तहत बड़े-बड़े वादे कर लिए हों लेकिन पाकिस्तानी सेना को वह मंजूर नहीं। पाकिस्तान में लोकतंत्र महज एक रबर स्टैंप के शिवाय कुछ और नही है। सेना की तानाशाही लगातार जारी है। पाक सेना अपने रसूख में कोई कमी नहीं आने देना चाहती यही वजह है कि पाक की कथनी और करनी में जमीन आसमान का फर्क है। आजादी के बाद से इन छह दशकों के बीच में चार बड़े युद्ध और दर्जनों शांति वार्ता व समझौते इस बात की प्रमाणिकता को जाहिर करते हैं। युद्ध तो जरूर हुए लेकिन न तो भारत कुछ हासिल कर पाया न तो पाक। हालात तब भी वही थे और आज भी वही हैं। अगर आज के हिसाब से देखा जाए तो उससे भी कहीं ज्यादा बदतर।
पाक ने जब-अपना नापाक चेहरा दिखाया है तब तब मंजर बेहद खौफनाक रहा है। वह बार बार खून की होली खेलता रहा और हम अपने ही लोगों के खून की स्याह से शांति वार्ता की पटकथा लिखते रहे।
वैसे तो भारत पाक मुद्दा हमेशा ही सुर्खियों में बना रहता है लेकिन इस बार यह मुद्दा एक बार फिर उस समय गर्माया है जब अरब देश इस तरह की मुसीबतों से दो-चार हो रहे हैं। मौजूदा दौर में काश्मीर की हालत फिलिस्तान और इजराइल के बीच फंसे गाजा पट्टी से कुछ कम नही है। बंद कमरे वार्ता की खनक सीमा पर सुनाई देती है,मानों रिमोट कहीं और रिएक्शन कहीं और । अब वक्त आ गया है कठोर फैसले लेने का और उन पर अडिग रहने का। लेकिन हां फैसलों के बीच काश्मीर को दूसरी गाजा पट्टी बनने से भी रोकना होगा।
प्रशांत सिंह
9455879256

Wednesday, November 13, 2013

Pray for THIS GOD to THAT GOD.

I was not born when Sachin starts playing cricket. I am not too much crazy about cricket. I am also not sachin's crazy fan,but when ever i watch cricket i always pray for this god to that god. No doubt he is a great player.
I remember a scene, it was 2000-01,when  i was in 3rd standard. I was giving my session examination. And after solving some questions my pen stops at question no.6 which was "Write the name of any three cricket player." And that time i was compelled to think hard. That time i knows the name of one and only Sachin Tendulkar & after so much puzzling i write two names first was Sachin Tendulkar & second was Ajay Jadeja.
After the exam the whole class discussed the question paper with each other & the most amazing out come from the discussion was that the whole class writes a common name that is "SACHIN TENDULKAR".

Wednesday, October 23, 2013

शाहिद आज़मी: एक गुमनाम मसीहा




             शाहिद के बारे में काफी दिनों से सुन रहा था। सुनते सुनते मुझसे रहा नहीं गया और मेरे कदम खुद ब खुद सिनेमा हाॅल की तरफ बढ़े चले गए। इतने दिन टालमटोल करने के बाद आखिरकार आज हंसल मेहता की ‘‘शाहिद’’ देख डाली। फिल्म का पहला ही दृश्य दिल में छेद करने के लिए काफी है। वहीं से मुझे समझ आ गया कि आखिर क्यों शाहिद की शहीदी पिछले कुछ समय से चर्चा का विषय बनी हुई है।
             मैं यहां पर कोई फिल्म की समीक्षा नहीं कर रहा। बल्कि उस शाहिद की कहानी के बारे में बताना चाह रहा हूं जो समय की पर्त में लिपटी हुआ गुमनामी के अंधेरे में कहीं किनारे पड़ी धूल खा रही थी। शाहिद चला गया लेकिन अपने पीछे काफी कुछ छोड़ गया। हंसल मेहता ने फिर दोबारा शाहिद आज़मी को जिंदा कर दिया। तमाम बेगुनाहों की आखिरी आस बन चुके शाहिद को 2010 में मौत के घाट उतार दिया गया था। 14 वर्ष की उम्र में 1992 में  बाबरी मस्जि़द ढ़हाए जाने के दौरान दंगा फैलाने के केस में गलत फंसाए जाने से क्षुब्द्ध शाहिद ने पाकिस्तान जा कर हथियार चलाने का प्रशिक्षण भी लिया। वहां से लौटने के बाद उसे एक बार फिर सलाखों के पीछेे जाना पड़ता है। जेल में ही उसे आगे पढ़ने की ललक जाग उठती है। जेल से निकलने के बाद शाहिद वकील बनकर उसके जैसे तमाम बेगुनाहों को न्याय दिलाना उसका मकसद बन जाता है। दूसरों के हक के लिए लड़ते लड़ते वह खुद से हार जाता है। मात्र 33 वर्ष की उम्र में 11 फरवरी 2010 को उसके आॅफिस में ही उसकी गोली मार कर हत्या कर दी जाती है। वकील के रूप में अपने छह साल के कैरियर में उसने 17 बेगुुनाहों को बरी कराया। जिनमें से अधिकतर मुस्लिम युवक थे।
          आज शाहिद पूरी दुनिया के सामने है भले ही वह हमारे बीच न हो। हकीकत यह है कि आज शाहिद का परिववार उस पर बनी फिल्म नहीं देखना चाहता, खासतौर पर उसकी अम्मी उसे दोबारा मरते हुए नहीं देखना चाहती और शायद हम सब भी.................

Sunday, October 6, 2013

डर के आगे जीत है


भय का पूरा मनोविज्ञान इसी वाक्यांश पर आधारित है ’’डर का कारण वही है, जो वास्तव में नही है’’।
        जरा कल्पना कीजिए कि रात में आप घर पर अकेले हों और आपको बाथरूम से पानी टपकने की आवाज सुनाई दे, कमरे का दरवाजा की चर्र-चर्र की ध्वनि के साथ धीरे-धीरे खुले और परदे के पीछे किसी की परछाई दिखाई पड़े। या फिर आप रात में सुनसान रोड़ में गाड़ी चला रहे हों और अचानक आपको बीचो बीच सड़क पर खड़ी एक औरत दिखाई पड़े..................
आमतौर पर कुछ ऐसे ही भयानक भयानक किस्से लोगों को डराने के काम आते हैं। बाहर बाजार में भय बेचा जा रहा है। स्टेशन पर लगे बुक स्टालों से लेकर सिनेमा हाॅल तक डर बिक रहा है। हमें डर लगता है हम जानते हैं। फिर भी हम डरने के लिए भूत प्रेत की कहानियों वाली किताबें खरीद कर पढ़ते है, हाॅरर मूवीस् देखने जाते हैं। भारत में आज भी सबसे ज्यादा भूतों का प्रकोप है। हर मुहल्ले से आपको भूतों का एक नया किस्सा मिल जाएगा। जितने लोग उतने प्रकार के भूत। किसी ने उल्टे पैर वाला भूत देखा तो किसी ने नाक के बल बोलने वाला भूत देखा है। समय के साथ भूतों की वैराइटी में भी परिवर्तन हो रहा है। पुराने समय में लोग नर भूतों को देखा करते थे। फिर बीच में खुले बाल, सफेद साड़ी में लिपटी नारी भूत नजर आने लगी। वर्तमान में बच्चों को भूत बना कर पेश किया जा रहा है। पिछले साल रामगोपाल वर्मा ने अपनी फिल्म भूत रिटर्नस् में ऐसा ही प्रयोग किया था।

भारत में भुतही आत्माओं के काफी किस्से प्रचलित हैं। कई इमारतें आधिकारिक रुप से हाॅन्टेड घोषित की जा चुकी हैं। इन्ही में से एक राजस्थान स्थित भानगढ़ के किले के बारे में एक बेहद रोचक किस्सा प्रचलित है, लोगों का मानना है कि बहुत समय पहले यहां रत्नावती नाम की बहुत सुंदर राजकुमारी रहती थी जिस पर काला जादू करने वाले तांत्रिक की कुदृष्टि थी। तांत्रिक ने अपने जादू से राजकुमारी को अपने वश में कर उसका शारीरिक शोषण किया। लेकिन एक दुर्घटना के चलते उस तांत्रिक की मृत्यु हो गई और आज भी उस तांत्रिक की आत्मा वहीं भटकती रहती है। तांत्रिक के श्राप के अनुसार वह स्थान कभी भी बस नहीं सकता। वहां रहने वाले लोगों की मृत्यु हो जाती है लेकिन उनकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती। और भी अनेक इमारतें तरह तरह की भ्रांतियों और अंधविश्वास के लिए चर्चित हैं।
एक शोध के अनुसार पता चलता है कि मनुष्य को सबसे ज्यादा भय रात के समय लगता है या फिर तब जब वह अकेला होता है। एक साधारण मनुष्य के जीवन में भय एक ऐसी चीज है जो उसका ताउम्र पीछा नहीं छोड़ती। किसी को मौत से भय लगता है तो किसी को असफलता से ,किसी को सांप से तो किसी को बंदर से, आदि आदि तरह से लोगों को डर लगता है। इसी भय के साथ मनुष्य के मष्तिस्क में नकारत्मक ख्याल उपजने शुरू हो जाते हैं। साइंस के अनुसार भूत प्रेत और आत्माएं इंसानी दिमाग की ही उपज है। इंसान ने ही अपनी कल्पना के आधार पर भूत-प्रेतों को जन्म दिया है। इंसानो ने ही भूतों के आने-जाने का समय तय कर दिया उनके रहने का स्थान तय कर दिया। समय के साथ साथ भूतों ने इंसानी मस्तिष्क पर डेरा डालना शुरू कर दिया और आज इंसान अपने ही दिमाग की उपज से भयभीत होता रहता है। मनुष्य कौम अप्रत्याशित चीजों से सबसे अधिक भयभीत रहती है। वास्तविक समाज में नर मनुष्य सबसे ज्यादा क्रूर हैं हिंसक हैं इसलिए प्रायः उनका भूत नही गढ़ा जाता, स्त्री और बच्चे जिनके हिंसक होने की हम कल्पना भी नहीं कर सकते अधिकांशतः उन्ही को भूत बनाकर पेश किया जाता है और हम उनसे डरते हैं क्यों कि वह हमारे लिए अप्रत्याशित है। भय का पूरा मनोविज्ञान इसी वाक्यांश पर आधारित है ’’डर का कारण वही है, जो वास्तव में नही है’’।
धीरे-धीरे मीडिया ने भी भय को भुनाना शुरु कर दिया। फिल्म जगत के तमाम बुद्धिजीवियों ने भय बेंच-बेंच कर लाखों-करोड़ो कमाए। फिल्मों में खिड़कियों की धूम-धड़ाम, तेज हवा में जलती मोमबत्ती पकड़े औरत, परदे के पीछे परछाई, हवेली से आती घुंघरूओं की आवाज, बीचो बीच सड़क पर सफेद साड़ी में लिपटी खड़ी औरत आदि आदि के दृश्यों के माध्यम से भूतों को आकार देने की कोशिश की गई।   कहते है भय की भयावहता उसकी अधिकता के साथ क्षीण पड़ने लगती है। फलस्वरुप, समयोपरान्त लोगों ने प्रत्येक हाॅरर फिल्म में दिखाए जाने वाले इन्ही घिसे पिटे दृश्यों को देखकर डरना बंद कर दिया तो उन्हे दूसरे तरीकों से डराना शुरू कर दिया गया। जिन लोगों ने भूतों पर पूरी तरह काबू पा लिया गया है उनका खून चूसने के लिए नया हीरो ‘जांबीस’ जन्म ले चुका है। गो गोवा गाॅन के रिलीज के साथ ही भारत में भी जांबीस पदार्पण कर चुके हैं।
जैसे-जैसे लोगों ने पुराने किरदारों से डरना बंद कर दिया उन्हे डराने के लिए नए नए किरदार गढ़े जाने लगे। लोगों को सबसे ज्यादा भय नकारात्मकता से लगता है। अगर हम नकारात्मक सोचना बंद कर दें तो काफी हद तक भय से छुटकारा पाने में सक्षम हैं क्यों कि डर के आगे जीत है।

प्रशांत सिंह
9455879256

Saturday, July 20, 2013

दिल्ली एक अनुभव

अब तक दिल्ली के बारे में काफी कुछ सुन रखा था। उन्ही सुने सुनाए वाक्यांशो के आधार पर मैंने अपने दिलों दिमाग में दिल्ली की एक इमेज़ बना ली थी जिसमें साफ-सुथरी और चैड़ी-चैड़ी रोडों पर चमचमाती बड़ी-बड़ी गाडि़यां, उंची उंची इमारतें, और विदेशी पर्यटक और और माॅर्डन लड़के-लड़कियां शामिल थे।
होश संभालने के बाद जब मैंने पहली बार जब नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर कदम रखा तो एकबारगी लगा कि जो तस्वीर मैंने अपने जेहन में बसा रखी थी यह एकदम उसके उलट है। लेकिन चार फर्लांग आगे चलते ही मेट्रो स्टेशन के अंदर पहुंच कर यह मिथ्य झूठा साबित होने लगा। लेकिन नेहरु प्लेस जैसे सुप्रसिद्ध आई.टी. मार्केट के परिसर में फैली गंदगी न जाने क्या संदेश देना चाह रही थी। और दिलशाद गार्डेन के निकट सीमापुरी के इलाके की हालत देखें तो खुद को देल्ही एन.सी.आर. में खड़े होने पर शक पैदा हो जाएगा। खैर जो भी हो, पूरे भारत का समागम भी तो दिल्ली में ही है आखिर राजधानी जो ठहरी। लम्बी चैड़ी रोड़ों पर दिल्ली परिवहन की बेहतर बस सर्विस और बेहद तेज मेट्रो रेलगाड़ी वाकई काबिले तारीफ है। दिल्ली की सड़कों पर कई लोग तो बेहद सभ्य और परोपकारी दिखे लेकिन कुछ की हैवानियत भरी निगाहें किसी भी इज़्जत दार लड़की को असहज महसूस कराने के लिए काफी थीं। संयोग वश मेरा रोहिणी इलाके से भी गुजरना हुआ, जो कि पिछले साल हुए रेप कांड से चर्चा-ए-आम हो गया था।
    डी.एल.एफ. जैसे बिल्डरों की इमारतों में जाकर डेवलप्ड देल्ही की चकाचैंध स्पष्ट नज़र आती है। घूमना तो और भी कई जगह चाहता था लेकिन समय के अभाव के कारण इस आॅफिशियल ट्र्पि को टूरिस्ट ट्र्पि में नहीं बदल सका। इंडि़या गेट सरीखे ऐतिहासिक स्थलों को काफी दूर से ही बाॅय-बाॅय कर दिया। अगर ईश्वर ने मौका दिया तो जल्द ही दोबारा जा कर रेड फोर्ट, इंडि़या गेट, और अन्य तमाम जगहों को बेहद नजदीकी से जानना चाहूंगा। कुल मिला कर देल्ही एन.सी.आर. ने एक मिला जुला अनुभव प्रदान किया।