Thursday, July 16, 2015

लौकी की बर्फी


(29 जून 2015 को जनसत्ता में प्रकाशित जनसत्ता की वेबसाईट पर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें अथवा जनसत्ता के ई-पेपर में पढ़ने के यहां क्लिक करें)

बकी बार जब घर से लौट रहा था तो घर पर मां नहीं थीं। कोई जरूरी काम आ जाने की वजह से वे कुछ दिनों के लिए बाहर गई थीं। हालांकि महीनों बाद कुछ दिनों के लिए घर जाना और कई महीनों के लिए फिर वापस लौट आने की जब बारी आती है तो हर कोई भावुक हो जाता है। सालों तक हमारे नखरे सहने वाले माता-पिता, जिस घर की दीवारों में आपकी सांसें बसती हों, जो परिवार आपके पीछे साए की तरह खड़ा रहता हो, उसे छोड़ कर जाना वाकई आसान काम नहीं है। घर से विदा लेने की इस नाजुक घड़ी में भावुकता कई बार तो आंसुओं के रूप में भी बाहर आ जाती है।
हर बार की तरह मैंने फिर हंसते हुए घर से कुछ यों विदा ली, मानो पास के नुक्कड़ तक जाकर वापस आना हो। परिवार का हर सदस्य घर की चौखट पर से मुझे विदाई दे रहा था। इस बीच मैं जरा भी भावुक नहीं दिखा या फिर भावुक न होने का नाटक कर रहा था। उन सबके मुस्कराते चेहरे मुझमें घर से दूर रहने की इच्छाशक्ति भर रहे थे। अहिस्ता-अहिस्ता मेरे और उनके बीच फासला बढ़ता जा रहा था। आंखों के सामने सब धुंधला पड़ने लगा था। मगर मेरी आंखें कुछ खोज रही थीं। शायद वह मां थीं, जिन्हें मैं खोज रहा था। मां के बिना चौखट सूनी लग रही थी। उन सबसे रुखसत होते हुए मैं दोबारा पलट कर देखने की हिम्मत नहीं जुटा सका। अंदर भावनाओं ने उथल-पुथल मचा रखी थी, लेकिन मैं मुस्कराते हुए विदा हो रहा था, अगले कुछ महीनों के लिए।
पूरे सफर के दौरान मां और उसके हाथ की बनी लौकी की बर्फी याद आती रही। अमूमन मैं घर से खाने-पीने की चीजें अपने साथ नहीं ले आता। शायद इसलिए कि बाहर रहते हुए वह मेरी कमजोरी न बन जाए। काफी ना-नुकुर के बाद आखिर मैं मां से हार ही जाता था। पिछली बार करीब 6 महीने पहले घर गया था। वापस लौटते वक्त मां ने चोरी-छिपे मेरे बैग में घर की बनी लौकी की बर्फी रख दी थी। यह शायद मां की ममता ही है, जो शून्य में भी संभावनाएं तलाश लेती है। मुझे याद है कि उस बार जब मैं लौटा था तो बर्फी के हर एक टुकड़े के साथ खूब रोया था। शायद ये वही आंसू थे, जो हर बार घर से विदा होने के वक्त मैंने अपनी छाती में दफ्न कर रखे थे। बर्फी का अंतिम टुकड़ा खत्म होने तक यह सिलसिला जारी रहा। उसे याद कर आज भी आंसू निकल आते हैं।
इस बार गांव में करीब दस दिन बिताने के बाद जब लौट कर इंदौर पहुंचा तो बिना देर किए पूरा बैग पलट डाला। हालांकि मैं यह जानता था कि बैग में कपड़ों के अलावा कुछ और नहीं है। हर बार की तरह इस बार भी मैंने घर के सदस्यों के तमाम आग्रह के बावजूद कुछ भी साथ ले जाने से इनकार कर दिया था। इस बार घर में जोर-जबरदस्ती करने वाली मां नहीं थीं। लेकिन यह शायद मां की ममता ही थी, जिसने मुझे बैग खंगालने को मजबूर कर दिया। इसके बावजूद मैं न जाने किस उम्मीद में कपड़ों की तह खोलते हुए उसमें कुछ खोज रहा था कि अचानक फिर से मां के हाथ की बनी लौकी की बर्फी याद आ गई। बस फर्क यह था कि इस बार मेरे हाथ में बर्फी की जगह कपड़े थे, जिन्हें हाथ में लेकर मैं बिना रुके रोए जा रहा था!

Monday, April 6, 2015

क्यों कि तुम स्त्री हो...

डीएनए में 6 अप्रैल 2015 को प्रकाशित
7 अप्रैल 2015 प्रभात खबर,पटना

Saturday, April 4, 2015

क्यों कि तुम स्त्री हो...


मैं पुरुष हूं, तुम स्त्री हो और
स्त्रियों की तरह रहो। तुम्हारे चारो तरफ लक्ष्मण रेखा खिंची हुई है, उसके अंदर रहो।  भारत पुरुष प्रधान देश है। मुझे नहीं अच्छा लगता कि कोई स्त्री मुझसे ज्यादा काबिल बने, या फिर उसके मामलों में दखलंदाजी करे। तुम सदियों से चाहरदिवारी के पीछे कैद एक नौकरानी की तरह रहती आई हो और उसी तरह रहो। तुम मेरे लिए एक वस्तु की तरह हो वस्तुत: बनने की कोशिश भी न करो।   

तुम घर में काम करने के लिए बनी हो। तुम बच्चे पैदा करने के लिए बनी हो। तुम पुरुषों को सुख देने के लिए बनी हो। तुम्हे न बोलने का हक है। न खुलकर हंसने का और न ही खुलकर रोने का। तुम वही करोगी जो मैं तय करूंगा। तुम वही पहनोगी जो मैं चाहूंगा। तुम्हे अपनी मर्जी चलाने का कोई अधिकार नहीं है। आंसू बहाना तुम्हारी किस्मत का सच है। क्यों कि तुम स्त्री हो और मैं पुरुष हूं। 

तुम्हारे शरीर के एक-एक अंग के बारे में, तुम्हारी हर एक हरकत के बारे में फैसला करने का अधिकार सिर्फ मेरे पास है। मैं कभी भी कहीं भी जा सकता हूं बिना तुमसे बताए। लेकिन तुम्हे कहां जाना है और क्या करना है इसका फैसला मैं करूंगा। क्यों कि तुम स्त्री हो और मैं पुरुष हूं।

मैं सिगरेट पियूं या शराब पियूं , गोश्त खाऊं ,तुमसे क्या मतलब। लेकिन तुम्हे क्या खाना है कब खाना है और क्यों खाना है ये मैं तय करूंगा। मैं देर रात घर लौटूं, या न लौटूं। तुमसे क्या मतलब। लेकिन तुम्हे कब सोना है कब जागना है, ये मैं तय करूंगा। क्यों कि तुम स्त्री हो और मैं पुरुष हूं।

 तुम्हे किससे शादी करनी है । क्यों करनी है। कब करनी है। यह भी मैं तय करूंगा । मैं अपने दोस्तों से आपस में क्या बात करता हूं, क्यों करता हूं, तुम्हे यह जानने का कोई हक नहीं लेकिन तुम्हे क्या बोलना है कब बोलना है और क्यों बोलना है, ये मैं तय करूंगा। क्योंकि तुम...! 

मैं दिन भर क्या करता हूं , कहां रहता हूं। तुम्हे यह जानने का कोई हक नहीं। लेकिन तुम दिनभर क्या करोगी कहां रहोगी यह भी मैं तय करूंगा। तुम चाहरदिवारी के भीतर ही अच्छी लगती हो। तुम्हारी जगह वहीं है। तुम्हे बाहर निकलने का कोई हक नहीं है। तुम मेरे लिए एक वस्तु हो। मैं तुम्हारे साथ कभी भी कुछ भी कर सकता हूं। तुम्हे डांट सकता हूं, झिकझोर सकता हूं। यहां तक कि तुम्हे पीट सकता हूं। लेकिन तुम्हे मेरे ऊपर हाथ उठाने का कोई हक नहीं है। क्यों कि तुम...! 

मैं जब चाहूं तब तुम्हारे साथ सेक्स करूं, जोर-जबरदस्ती करूं , छेडख़ानी करूं, कमेंट पास करूं, भद्दी टिप्पणियां करूं, बिस्तर पर अपनी मर्जी चलाऊं, पराई औरत संग सेक्स करूं , सब मेरी मर्जी है। मैं दो शादी करूं या चार। मैं दो पत्नियां रखूं या दो दर्जन। लेकिन तुम दो शादी नहीं कर सकती, दो पति नहीं रख सकती। दो पुरुषों के साथ सेक्स नहीं कर सकती। बिस्तर पर अपनी मर्जी नहीं चला सकती। तुम्हे कितने बच्चे पैदा करने है, क्यों करने हैं और कब करने हैं । लड़की पैदा करना है या लड़का । ये मैं तय करूंगा। क्यों कि ...! 

हां तुम स्त्री हो और स्त्री की यही परिभाषा है। हमारा समाज स्त्री को इसी नजर से देखता है। पुरूषों की मानसिकता में स्त्री इससे ज्यादा कुछ  भी नहीं है। तुम भले ही लाख वूमेन एम्पावरमेंट चिल्ला लो, लेकिन मेरी नजर में तुम्हारी परिभाषा नहीं बदलने वाली। क्यों कि ...! 

हाल ही में दीपिका पादुपकोण और वोग मैग्जीन ने वूमेन एम्पावरमेंट को इंगित करता मॉय च्वॉइस नाम का एक वीडियो जारी किया था। जिसके बाद से बुद्धिजीवियों और फेमिनिस्टों में लंबी बहस छिड़ गई है। एक ओर जहां मॉय च्वॉइस नामक इस वीडियों के साथ दीपिका की जम कर आलोचना हो रही है, वहीं कुछ लोग महिला सशक्तिकरण को लेकर वीडियो और दीपिका के सर्मथन में झंडा बुलंद कर रहे हैं। हालांकि इस वीडियो के पक्ष से ज्यादा विरोध में सुर उठे हैं। इस बात से यह फिर से साबित हो जाता है कि एक स्त्री को पुरुषों की अपेक्षा से इतर जाकर कुछ सोचने का अधिकार नहीं है। 

हालांकि सेक्सिज़म और अश्लीलता को वूमेन एम्पावरमेंट बताना मुद्दे के साथ बेईमानी होगी। मगर इस मुद्दे पर  उंगली उठाने वाले खुद अपनी गिरेबान में झांक कर देखें तो वह उतने ही नंगे नजर आएंगे जितना कि यह वीडियो औरतों को कपड़े उतारने और सेक्सिज़म को प्रेरित करता है। आखिर क्यों ऐसा होता है कि हर पुरुष राह चलती औरत के कपड़ों के भीतर झांक कर देख लेना चाहता है? क्यों खयालों ही खयालों में उसे नंगा करने की जुगत में लगा रहता है? जिस दिन पुरुष इन सवालों का जवाब तलाश लेंगे उस दिन से एक स्त्री को महिला सशक्तिकरण के लिए लड़ना नहीं पड़ेगा। आज जब स्त्रियों के लिए किसी ने दमदारी के साथ आवाज उठाई है तो हम नैतिक संस्कारों और मूल्यों का दुहाई देते फिर रहे है। क्या स्त्री होना वाकई इतना कठिन है। क्या जिंदगी के रंग मंच में स्त्री के लिए इससे बेहतर कोई और स्क्रिप्ट नहीं लिखी गई। आखिर स्त्री और पुरुष एक ही कोख से जन्में दो पहलू हैं। दोनों ईश्वर की समान कृति हैं। फिर स्त्री होना इतना कठिन क्यों है?


Wednesday, March 25, 2015

हाशिमपुरा तुम भारत से हार गए!



''हाशिमपुरा'' , अचानक से चर्चा में आया यह शब्द मेरे लिए एकदम नया था। हो भी क्यों न नया? यह घटना तब की थी जब मैं पैदा भी नहीं हुआ था। जब तक मैं समझ पाता कि यह क्या बला है, उससे पहले ही अखबार , टीवी, सोशल मीडिया सब जगह हाशिमपुरा  जंगल में लगी आग की तरह फैल गया। 

जब इस हाशिमपुरा नामक आग के दरिया में थोड़ा करीब से झांक कर
देखा तो पता चला कि इतिहास में कितना कुछ दफन है। बीते 28 सालों से मुर्दे की तरह दफन इस मामले के बारे में इससे पहले शायद मैनें कभी नहीं सुना था, या सुना भी होगा तो याद नहीं। आज इस हाशिमपुरा नरसंहार के 28 साल बीतने के बाद भी लपटें किसी को भी झुलसाने के लिए काफी हैं। दिल्ली से सटे मेरठ के हाशिमपुरा में 22 मई 1987 को पीएसी के जवानों ने मुस्लिम समुदाय के 42 लोगों की गोली मार कर हत्या कर दी थी। हुआ कुछ यूं था कि 1986 में तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने अयोध्या के विवादित ढ़ांचे को खोलने का फैसला लिया था। जिसके बाद से ही उत्तर प्रदेश में रह-रह कर दंगे भड़कते रहे थे। धीरे-धीरे दंगों की आग मेरठ जिले तक पहुंची। 21 मई 1987 को मेरठ के हाशिमपुरा में एक युवक की हत्या कर दी गई। हत्या के बाद हाशिमपुरा जल उठा। कैसा जल उठा होगा? उस समय क्या हालात रहे होंगे? मुझे पता नहीं। जहां तक मैं अंदाजा लगा सकता हूं, शायद मुजफ्फर नगर दंगो की तरह या उससे भी अधिक भयावह हालात रहे होंगे। पूरा इलाका दंगे की चपेट में आ चुका था।  गली-चौराहे की दुकानों को आग के हवाले किया जा चुका था। दंगा-फसाद चरम पर था। 

22 मई, 1987 को जवानों से लदा पीएसी का एक ट्रक मस्जिद के सामने रुकता है। मस्जिद में धार्मिक सभा चल रही थी। ट्रक से भारी संख्या में जवान उतरते हैं और सभा में शामिल लोगों को हिरासत में ले लेते हैं। यह था इस घटना का पहला दृश्य दूसरा दृश्य इस नरसंहार के पीडि़त मोहम्मद उस्मान की जुबानी, '' उस्मान बताते हैं कि
हम घर पर थे। मैं, मेरे वालिद के साथ बैठा था। कुछ लोग तलाशी के बहाने से आए और हमें घर से बाहर निकाला। हमसे हाथ ऊपर करने को कहा गया और फिर हमें पीएसी के हवाले कर दिया गया। हमने देखा कि वहां बहुत सारे लोग पहले से बैठे हुए थे। शाम के समय सब को ट्रकों में भर के सिविल लाइन्स थाने भेजा गया। फिर उसके बाद करीब 50 मर्दों को छांट कर अलग किया गया। औरतों और बच्चों को एक तरफ कर दिया गया औरतों और बच्चों को छोडऩे को कह दिया था और हमें छांट कर एक तरफ खड़ा कर दिया गया।''

इसके बाद जो हुआ उसका बखान करने में शायद किसी का भी कलेजा कांप उठे। सूरज ढ़लने के बाद सभी को पीएसी की 41 बटालियन के एक ट्रक में लादा गया।  सभी को ट्रक में बैठने के लिए कहा गया और पीएसी के जवान उनकी निगरानी के लिए खड़े रहे। पीएसी के इरादों से बेपरवाह वह सभी शून्य भाव होकर एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे। उन बेचारों को क्या पता था कि यह उनकी जिंदगी का आखिरी सफर होगा। ट्रक को मुरादाबाद की गंग नहर की ओर ले जाया गया था। नहर के​ निकट एक जगह ट्रक को रोका गया। वहां एक व्यक्ति को नीचे उतारा गया और उसे गोली मार दी गई। और यह देख ट्रक में बैठे बाकी के लोग सहम गए। पीएसी के इरादों की भनक लगते ही उनमें से कुछ ने हिम्मत कर के ट्रक से कूद कर भागने की कोशिश की लेकिन जवानों ने उन्हें वहीं का वहीं छलनी कर दिया। इसके बाद सभी को नहर में फेंक दिया गया। इस घटना में  42 लोग मारे गए थे। 

यह मामला 28 सालों से कोर्ट में था। समय के साथ इस मामले में भी धूल की परतें भी मोटी हो चुकी थी। न्याय का इंतजार करते-करते पीडि़तों के बाल सफेद हो गए थे। सालों बाद घटना की जांच रिपोर्ट सौंपी गई। मामला दर्ज हुआ।  161 गवाह बने और पीएसी के जवानों को आरोपी भी बनाया गया।  16 जवानों पर मुकदमा चला। 21 मार्च को अदालत ने फैसला सुनाया। लेकिन अदालत ने आरोपियों को सबूतों के अभाव का हवाला देते हुए बरी करने का हुक्म सुनाया। सालों से दफन हाशिमपुरा मामले में फैसला तो आ गया लेकिन जीत किसकी हुई? हाशिमपुरा पीडि़तों की या फिर खुद को कानून पर चलने वाले संविधानिक गणतंत्र कहने वाले भारत की? 

Tuesday, February 24, 2015

जासूसी कांड: गहरी हैं जड़ें

पेट्रोलियम मंत्रालय में जासूसी कांड  के खुलासे के बाद से ही सरकारी महकमे में हड़कंप मच गया। हालांकि सरकारी मंंत्रालयों में जासूसी की यह पहली घटना नहीं है। देश के सौदागारों का यह गोरखधंधा पिछले कई सालों से चल रहा था। इस जासूसी कांड ने सन 1980 के दशक की यादों को फिर से ताजा कर दिया है, लेकिन इतने व्यापक स्तर पर सरकार की नाक के नीचे से दस्तावेजों की चोरी को अंजाम देना और किसी को भनक न लगना समझ से परे है। इसमें जरूर किसी साजिश की बू आती है। और तो और अब  कोयला और ऊर्जा मंत्रालय के संग जासूसी की चपेट में रक्षा मंत्रालय भी आ गया है।
हालांकि इस बार आरोपी कानून के हत्थे चढ़ गए हैं, लेकिन उनके पीछे बैठे उनके आकाओं तक पहुंचने में कानून के हाथ छोटे भी पड़ सकते हैं। पकड़े गए आरोपियों से देश के बड़े कॉर्पोरेट घरानों के संबंध भी साबित हो गए हैं। गिरफ्तार आरोपियों में से शीर्ष ऊर्जा कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों समेत तकरीबन दर्जन भर गिरफ्तारियां हुई हैं। गिरफ्तार किए गए लोगों में से आरआईएल के शैलेष सक्सेना, एस्सार के विनय कुमार, केयर्न से केके नाईक, जूबिलैंट एनर्जी के सुभाष चंद्रा और एडीएजी रिलायंस के ऋषि आनंद व मंत्रालय के कर्मचारियों संग बिचौलिए भी शामिल हैं, जबकि जासूसी नेटवर्क की जड़ें और भी गहरी होने का अनुमान है। और तो और जासूसी के तार अब चीन और पाकिस्तान से भी जुडऩे के संकेत मिल रहे हैं।
जासूसी कांड की एक कड़ी अंबानी बंधुओं से भी जुड़ती है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अंबानी घराने के रिश्ते जगजाहिर हैं। ऐसे में सरकार की भूमिका अहम रहेगी। क्या कानून के दायरे में अंबानी को भी खड़ा किया जाएगा? या फिर सिर्फ पकड़े गए कंपनी के कर्मचारियों को बलि का बकरा बना कर मामले को दफन कर दिया जाएगा। इस जासूसी कांड से यह बात स्पष्ट रूप से उभर कर आती है कि कॉर्पोरेट घरानों ने अपने फायदे के लिए न सिर्फ राजनेताओं का इस्तेमाल किया बल्कि जासूसी का भी सहारा लिया।
हालांकि गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि सभी आरोपियों को कठोरतम सजा दी जाएगी व मामले की जांच भी की जाएगी जिससे दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। अब देखना यह होगा कि सरकार आरोपियों को परदे के पीछे दफन करेगी या कॉर्पोरेट हाउसों को जनता के सामने लाकर बेनकाब करेगी।

Tuesday, February 3, 2015

वैलेंटाइन डे या प्रेम विवाह दिवस : प्यार के इजहार के बहाने अश्लीलता

फरवरी माह में प्रवेश करते ही मोबाइल, व्हाट्सएप, फेसबुक इत्यादि पर तरह-तरह के वैलेंटाइन डे से संबधित मैसेज, पोस्टों का आगमन शुरु हो गया है। प्यार की पींगे पनपनी शुरु हो चुकी हैं। गली-बगीचे, मॉल्स-मुहल्ले गुलजार होने लगे हैँ।
प्रेमी युगलों के लिए प्रेम के त्योहार की तरह मनाए जाने वाले वैलेनटाइन डे के लिए प्रेमियों ने प्यार का इजहार करने के लिए भरकस तैयारियां करनी शुरु कर दी हैं। बाजार भी ग्रीटिंग कार्डों से पटने शुरु हो गए हैं। बगीचे, चिडय़ाघर , मॉल्स और होटल्स का हर एक कोना प्रेम का साक्षी बनने को तैयार  है। मालियों ने भी एक-एक फूल की कीमत को समझना शुरु कर दिया है। तैयारियों में अभी शबाब का रंग सही से चढ़ भी नहीं पाया था कि हिंदू महासभा के ऐलान से प्रेमी जोड़ों में सन्नाटा छा गया। हिंदू महासभा ने अगामी १४ फरवरी को वैलेंटाइन डे को प्रेम विवाह दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। अब देखना यह होगा कि हिंदू महासभा अपनी इस घोषणा को अंजाम देने के लिए किस हद तक जाती है।
बीते दिनों हिंदू महासभा के द्वारा अंजाम दिए गए सुपर-डुपर हिट घर वापसी और लव जिहाद जैसे कार्यक्रम बेहद चर्चित व विवादित रहे। देश भर में  घर वापसी जैसे मुद्दे पर विवाद अभी भी जारी है। गौरतलब है कि हिंदू महासभा के कुछ पदाधिकारियों ने इसे घर वापसी का सेकेंड पार्ट भी बता डाला है। पिछले दिनों नौबत यहां तक पहुंच गई थी कि  प्रधानमंत्री मोदी ने विश्व हिंदू परिषद व हिंदू महासभा की इन हरकतों से आजिज आकर पद छोडऩे तक की धमकी दे दी थी। हालांकि महासभा की इस घोषणा में कुछ खास नया नहीं है। इसके पहले भी वैलेनटाइन डे पर हिंदू महासभा और विहिप का काला साया मंडराया रहता था। सरेआम अराजकता  फैलाने वाले इन तरह के संगठनों से प्रेमी युगल खौफजदा रहते थे। अराजकता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ सालों से भाई-बहन भी इस विशेष दिन एक साथ  घर से बाहर निकलने से डरने लगे थे।

लेकिन अगर वैलेनटाइन डे के दूसरे पहलू को उठा कर देखें तो इसके अधिकांश हिस्से में अश्लीलता की बू आती है। प्यार को हवस के तराजू में तौलने वाले इस विशेष दिन प्रेेम का द्योतक मानना कितना उचित होगा। हवस, सेक्स को प्रेम की संज्ञा देना कहां तक सही है। अगर इस तरह के मामलों में गहराई से नजर डालें तो सात जन्मों तक साथ निभाने की कसम खाने वाले इन प्रेमी जोड़ों में से अधिकांश का प्रेम संबध  अगले सात महीनों तक भी नहीं टिकता। इन हालातों में पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित वैलेंटाइन डे को भारतीय समाज में मान्यता देना में  प्रेमी युगलों को सरेआम अश्लीलता का लाइसेंस देने जैसा है। एक ओर जहां तहजीब और अनूठी सभ्यता के लिए दुनिया भर में जानी-जाने वाली भारतीय संस्कृति के लोग दीवाने हैं, वहीं वैलेनटाइन डे जैसे पश्चिमी त्योहार भारतीय संस्कृति के लिए साक्षात् खतरे के समान हैं।
हालांकि बुराई वैलेनटाइन डे में नहीं बल्कि हमारे मनाने के तरीके में है। भारत में इस डे का मतलब सिर्फ बिनब्याहे प्रेमी युगलों के प्यार के इजहार का है। लेकिन कुछ संक्रमित सोंच वाले लेागों की वजह से इस त्योहार के मायने बदल गए है। जुबां पर वैलेनटाइन डे का नाम आते ही सेक्स और अश्लीलता का तड़का मालूम पड़ता है। जबकि बुद्धिजीवियों का कहना है कि यह सिर्फ प्रेमी प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि किसी बेटे के लिए उसके माता-पिता भी   वैलेनटाइन हो सकते हैं। यह दिवस प्रेम दर्शाने के लिए होता है और प्रेम तो सबके लिए हो सकता है। चाहे वह माता-पिता हों या भाई-बहन या फिर दोस्त। सिर्फ देखने का नजरिया बदलने की जरूरत है। 

Wednesday, January 21, 2015

अन्ना के तीन 'क'- किरण, कुमार और केजरीवाल

अगर समय रहते अरविंद केजरीवाल, कुमार विश्वास और किरन बेदी एक साथ खड़े होते  तो निश्चित तौर पर दिल्ली की सबसे बड़ी ताकत के रूप में उभरते।
सनसनाती सर्दी में दिल्ली में सियासी सरगर्मियां तेज हैं। आरोप-प्रत्यारोप का दौर बदस्तूर जारी है। दिग्गज मैदान में हैं। चुनावी चकल्लस है, दुविधा का माहौल है। जनता खामोश है। अन्ना अवाक हैं। 

एक बार फिर से दिल्ली में वही रौनक दिखाई दे रही है जिससे करीब सवा साल पहले दिल्ली की सड़कें गुलजार थीं। बंद कमरों से सत्ता चलाने वाले नेता दिल्ली की गलियों में खाक छानते घूम रहे हैं। भविष्य के जनप्रतिनिधि जनता के बीच जमीनी टोह लेते फिर रहे हैं। आम तौर पर यह नजारा प्रत्येक चुनाव के पहले नजर आता है। लेकिन इस बार का दिल्ली चुनाव खास है। नतीजे दिलचस्प होंगे। जिसका लोगों का बेसब्री से इंतजार है। जी हां, कभी एक मंच से एक ही सुर बोलने वाले अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी आमने-सामने हैं। दिल्ली की राजनीति में पिछले दिनों एक नया नाम जुड़ा था। वह थीं किरन बेदी। जनलोकपाल आंदोलन के समय टीम अन्ना के स्टार प्लेयर रहे केजरीवाल, किरण, और कुमार विश्वास पर लोगों की निगाहें टिकी हैं। दिल्ली के पिछले विधान सभा चुनावों में मुकाबला कांग्रेस बनाम आप का था। लेकिन इस बार मामला आप बनाम भाजपा न होकर किरण बनाम केजरीवाल का हो गया है। मुख्यमंत्री की  कुर्सी के इन प्रबल दावेदारों की ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा की चमक से जनता चकाचौंध है। वहीं कांग्रेस आउट ऑफ फ्रेम  है। 


अन्ना आंदोलन के बाद केजरीवाल ने नई राजनीतिक पार्टी का गठन किया था तो लोगों ने उनकी ओर सवालिया निशान खड़े किए थे । जब करीब दो साल पहले अन्ना के सफेदपोश मंचों से निकल कर के केजरीवाल ने बड़ा दांव खेला था, तब शायद अन्ना और उनकी टीम के लिए केजरीवाल उस शैतान बच्चे के समान थे जो घर के बड़ों की मर्जी के खिलाफ कोई काम शुरू करने  जा रहा था। समय के साथ केजरी और अन्ना में राजनीतिक तल्खियां भी बढ़ीं। सबने केजरीवाल को महत्वाकांछी करार दे दिया। तब शायद अन्ना,बेदी और उनके सहयोगियों ने इस बात की क्षणिक कल्पना भी नहीं की होगी कि पार्टी गठन के महज साल भर के भीतर केजरीवाल दिल्ली की सत्ता पर काबिज हो जाएंगे। यहां तक कि विरोधियों ने आम आदमी पार्टी के अस्तित्व तक को चुनौती दे डाली थी। कुछ लोग तो यहां तक कयास लगा रहे थे कि तत्कालीन दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद आम आदमी पार्टी खत्म हो जाएगी। लेकिन केजरीवाल की कर्मठता और जुझारूपन को दिल्ली की जनता ने नजर अंदाज नहीं किया। विधानसभा चुनावों में अप्रत्याशित जीत हासिल करने के बाद आम आदमी पार्टी ने खुद को साबित कर न केवल  विरोधियों व आलोचकों मुंह में करारा तमाचा मारा था बल्कि दिल्ली की सत्ता पर भी काबिज हुए थे। केजरीवाल ने भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा था। 

गौरतलब है कि जब केजरीवाल ने पार्टी बनाई थी उस समय अन्ना और बेदी राजनीति में जाने के खिलाफ थे। शायद पार्टी गठन के समय उन्होंने  अन्ना और बेदी को अपने फैसले से सूचित भी कराया होगा। लेकिन शायद उस समय उनकी पहचान सिर्फ अन्ना के मंच से थी। वह मंच ही उनकी ताकत था। केजरीवाल के राजनीति में प्रवेश करने पर एक बारगी लोगों ने यह भी सोंचने से गुरेज नहीं किया होगा कि मंच त्यागते ही केजरीवाल तबाह हो जाएंगे। खुद किरण बेदी की भी यही सोच रही होंगी। यही सोच कर उन्होंने आम आदमी पार्टी से दूरी बनाए रखी। लेकिन उनकी यह सोच ज्यादा दिनों तक काबिज नहीं रह सकी। लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी। चेहरा चमकाने की जुगत में अन्ना मंच से जुड़े कई चेहरे आप की शरण में जा पहुंचे। उनमें से कुमार विश्वास भी एक प्रमुख चेहरा थे। इन चेहरों ने आम आदमी पार्टी को आम से खास बना डाला। पार्टी ने धमाकेदार जीत के साथ अप्रत्याशित सफलता हासिल की थी। लेकिन अनुभव की कमी के आड़े दिल्ली में आप सरकार हनीमून पीरियड में ही नतमस्तक हो गई। अरविंद केजरीवाल ने 49 दिनों में ही इस्तीफा सौंप दिया। बड़ी जद्दोजहद के बाद चुनाव जीत कर आए आप के नेता इस फैसले से बौखला उठे। एक बार फिर से पार्टी टूट के कगार पर खड़ी हो गई थी। नेता बिचकने लगे थे। पद मोह के भूखे नेता सत्ता खोने के गम में उल्टे केजरीवाल पर ही अनाप-शनाप आरोपों की झड़ी लगानी शुरू कर दी थी। वक्त रहते केजरीवाल ने पार्टी को संभाला और एक बार फिर से चुनावों के लिए कमर कसनी शुरू की लेकिन इस बार वह अकेले मोर्चा संभाल रहे हैं। लेकिन संभलने के पहले ही किरण बेदी ने भाजपा ज्वाइन करके उनको करारा झटका दे दिया है। और तो और भाजपा ने उन्हें पार्टी ज्वाइन करने के महज पांच दिन के भीतर मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर केजरीवाल की धड़कने बढ़ा दी हैं। अन्ना आंदोलन के समय इन दोनों ने कभी सोंचा भी नहीं होगा कि उन दोनों की आमने-सामने की भिड़ंत होगी। पार्टी आला कमान को दिल्ली भाजपा में केजरीवाल की टक्कर लेने लायक कोई चेहरा नहीं नजर आ रहा था। इसलिए भाजपा ने चट मंगनी पट ब्याह वाली हालत में अरविंद की काट के लिए उन्हीं के कैडर का नेता चुना। 

आप पार्टी की शुरूआत से ही कदम दर कदम केजरीवाल के साथ चलने वाले कुमार विश्वास आप के मंचों से नदारद दिख रहे हैं। इस बार उन्होंने चुनाव से दूरी भी बना रखी है। हालांकि कुमार विश्वास पहले ही यह बात कह कर धमाका कर चुके हैं कि उन्हें पद का लालच नहीं। उनके पास सीएम बनने के ऑफर आए थे। अगर सीएम बनना होता तो वह 19 मई को ही दिल्ली के सीएम बन जाते। शायद यह कह कर उन्होंने खुद के लिए गहरी खाई खोद ली। भाजपा की तरफ से किरण बेदी के सीएम प्रोजेक्ट होते ही कुमार विश्वास को यह बात न निगलते बन रही होगी न उगलते। 


News Today 22 Jan 15
अन्ना आंदोलन के आत्मविश्वास से लबरेज यह तीन चेहरे लोगों में ऊर्जा प्रवाह करने का काम करते थे। अन्ना आंदोलन के यह तीन (क)- (कु)मार, (कि)रण और (के)जरीवाल का सफर एक साथ अन्ना के मंच से शुरू होता है। लेकिन मौजूदा समय में महज चार साल के भीतर तीन ताकतें रास्ते अलग-अलग रास्ते से एक ही दिशा में आगे बढ़ रही हैं। अगर समय रहते इन तीनों को यह बात समझ आ जाती तो दिल्ली में दोबारा चुनाव की नौबत न आती। लेकिन तब शायद हितों के टकराव की संभावना प्रबल हो जाती। इन सबसे दूर राजनीति को घटिया करार देते हुए अन्ना लोकपाल की राह देख रहे होंगे। खैर जो भी अब मुकाबला दिलचस्प होगा। 


पेपर बाजी-
Daily News Activist 23Jan 15

Sunday, January 18, 2015

शराब पर बहकती सरकार

​पिछले दिनों ऐसी खबरें आ रहीं थी कि मध्य प्रदेश सरकार शराब से वैट हटाने जा रही है । हालांकि बाद में कैबिनेट बैठक में मंत्रियो के विरोध के बाद शिवराज सिंह चौहान ने नई आबकारी नीति द्वारा प्रस्तावित इन परिवर्तनों को ​नकार दिया। 


(13 जनवरी को कैबिनेट की बैठक से ठीक पहले लिखा गया)
ऐसी खबर हैं कि मप्र सरकार ने शराब से वैट हटा लिया है। इसका मतलब है अब प्रदेश में शराब सस्ती हो जाएगी।  शराब सस्ती मतलब नशा सस्ता। नशा सस्ता मतलब बर्बादी सस्ती। बर्बादी मतलब खुद की बर्बादी। रिश्तों की बर्बादी। समाज की बर्बादी। अंतत: देश की बर्बादी।
  एक वाकया याद आता है, तकरीबन सालभर पहले मप्र सरकार ने प्रदेश को नशा मुक्त बनाने का दावा किया था। पार्टी के नेता सार्वजनिक कार्यक्रमों में शराब की बुराई करते नहीं थकते थे। गुजरात की तर्ज पर मप्र में भी शराब बंदी जैसे कानून लाने की कवायद शुरू भी कर दी थी लेकिन अब ऐसे फरमान जारी हो चुके हैं जिनसे शराब के दाम लगातार गिरेंगे।
सरकार के नुमाइंदों ने यह तक कहा था कि प्रदेश में अब एक भी नई शराब की दुकान नहीं खुलेगी। क्या ये वही सुशासन है, जो आम जनता के बीच नशा-मुक्ति कार्यक्रम चलाने की पैरवी कर रहा था। भाजपा के राज में देसी ठेकों पर विदेशी शराब ने भी सिर चढऩे की पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन विरोध के बाद भी देसी ठेकों पर फिलहाल विदेशी शराब के प्रवेश को ग्रहण लग गया है। बढ़ती नशाखोरी के इस दौर में भाजपा ने केंद्र में कुर्सी संभालते ही शराब और तंबाकू उत्पादों पर नकेल कसने की घोषणाएं की गईं थीं।
हालात आज  इसके ठीक उलट हैं। सरकार कदम दर कदम बहक रही है। भाजपा शासित राज्य में ही शराब की कीमतों में भारी गिरावट मतलब नशे की लत को बल देना है। इसके कुछ दिन पहले ही सिगरेट से भी वैट हटा लिया था। इस निर्णय के पीछे तर्क दिया गया है कि शराब की बिक्री बढऩे से प्रदेश सरकार को तकरीबन ६०० करोड़ रुपए सालाना की अतिरिक्त आय होगी। इससे भले ही सरकारी खजाने तंदरुस्त होंगे, लेकिन सामाजिक क्षति की भरपाई कौन करेगा? इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा? सरकार होगी या शराब होगी?
भारत में नशा एक बड़ी समस्या बन चुका है। देश का एक बड़ा युवा वर्ग नशे की गिरफ्त में है। युवाओं  के भरोसे भारत के सुनहरे भविष्य का सपना देखने वाली सरकारें भविष्य में किस भारत की कल्पना कर रही हैं? यह अकाट्य सत्य है कि नशा विनाश का कारण बनता है। यह हम जानते हैं, सरकार जानती है। फिर भी इस तरह शराब से टैक्स हटाकर नशाखोरी की लत को बढ़ावा देना विडंबना ही कहा जाएगा।

Thursday, January 8, 2015

क्या यही है रामराज ?

  हर हिंदू महिला को कम से कम चार बच्चे पैदा करने चाहिए। उत्तर प्रदेश के उन्नाव से भाजपा सांसद साक्षी महराज की नजर में चार बच्चे पैदा करने से धर्म व देश की रक्षा होगी। एक ओर सरकार जहां जनसंख्या को विकास की राह में रोड़ा मान हम दो,  हमारे दो का नारा दे कर देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है वहीं देश के एक सांसद का इस तरह का बयान  देना उचित नहीं है। 
  इन भगवा चोला धारियों के गैर जिम्मेदाराना बयानों से विवादों की लिस्ट में इजाफा हो रहा है। साक्षी महाराज को यह समझना चाहिए कि यदि चार बच्चे जनने से धर्म और देश की रक्षा होगी तो उत्तर प्रदेश इस मामले में अव्वल होता। 80 फीसदी हिंदू आबादी वाले देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले राज्य  उत्तर प्रदेश में प्रति दंपत्ति चार बच्चों का औसत है, जो कि केरल में प्रति दंपत्ति बच्चों की संख्या से लगभग दोगुना है। इन दोनों राज्यों की तुलना करने पर यह जग जाहिर है कि सबसे ज्यादा धार्मिक उन्मादों का गढ़ उत्तर प्रदेश ही है। कल्पना करिए कि पूरे देश भर में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य हो जाएं तो देश की हालत क्या होगी। 
   शायद साक्षी महराज ने प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांछी योजना मेक इन इंडिया का यही मतलब निकाला है। विशेषज्ञों की नजर में बढ़ती जनसंख्या न केवल सामाजिक और आर्थिक विकास के अभाव का नमूना है बल्कि सामाजिक आर्थिक विकास कम होने का मूल कारण भी है। साक्षी महराज ने इसके पहले भी नाथूराम गोड़से को सच्चा राष्ट्रभक्त भी बताया था। वहीं एक और भाजपा सांसद ने रामजादे-हरामजादे प्रकरण भी शुरू किया था। विहिप लगातार घर वापसी भी करा रही है। आज नसीहतें देने वाले यह नेता कब फतवा जारी करना शुरू कर दें इस बात का कोई अनुमान नहीं है।जन्म से ही हर व्यक्ति को हिंदू बताने वाले महंत सरस्वती और हर बच्चा मुस्लिम पैदा होता है  कहने वाले ओवैसी ने देश की 125 करोड़ जनता को हिंदू-मुस्लिम के बीच में लाकर खड़ा कर दिया है। क्या घर वापसी कर के चार बच्चे पैदा करना और नाथूराम गोड़से की पूजा करना आदि ही रामराज के द्योतक हैं? क्या इन्ही अच्छे दिनों के लिए जनता व्याकुल थी? 

Friday, January 2, 2015

2015 के नाम एक संदेश

डियर 2015,
31 दिसंबर की रात जब दुनिया शराब और शबाब के आगोश में तुम्हारे यानि 2015 के स्वागत में मदमस्त थी, ऐन वक्त मैं कमरे की खिड़की से सटा आसमान की ओर एकटक निहारे जा रहा था। बाहर जश्न मन रहा था। लोग पटाखे-फुलझडिय़ा छुटा कर तुम्हारे आगमन का स्वागत कर रहे थे। जाने क्यों ऐसा लग रहा था कि आसमान से उठती हर सतरंगी छटा में दिखावटी चमक थी। जाने क्यों इस चमक के भीतर झांक कर देख लेने की जिज्ञासा हो रही थी। इस रोशनी में ही 2015 की एक झलक पा लेने की लालसा हो रही थी। जब तक अपने मन को आसमान में बिखरी उस मनमोहक आतिशी चमक के निकट ले जाता तब तक वह रोशनी, वह चमक मद्धिम हो चुकी होती और बीच रास्ते से ही मन को सांत्वना देते हुए बेमन लौट आता। एक के बाद एक लगातार हो रही आतिशबाजी से आसमान रंगीला हो चला था, मानों वह कुछ दिखाना चाहता था। जश्न में हो रही यह आशिबाजी किसी का मनमोह रही थी तो यकायक उठती यह रोशनी किसी का कलेजा कंपा रही थी। नीले गगन पर रंग बिरंगी रोशनी की मखमली चादर धरती पर कुछ दिखाना चाह रही थी जो लोगों की नजरों से ओझिल था। वह क्या था जो लोग महसूस नहीं कर पा रहे थे?
शायद वह बीते साल की झलकियां थी। यह वह झलकियां थी जो खुद से नजरें चुरा रही थी। खुद को छिपाने का प्रयास कर रहीं थी। आसमान से पड़ती चमकीली रोशनी से धरती की अधनंगी हकीकत लज्जित महसूस कर रही थी। मानो जमीन के अंदर वह खुद की कब्र खोद लेना चाहती हों। शायद उनका कब्र में ही समा जान बेहतर रहेगा। ऐसी कब्र में जहां से उनका भूत भी कभी बाहर न आ सके।
जाने क्यूं ऐसा लग लग रहा था कि सिर्फ तारीख ही बदल रही है और कुछ नहीं। लेकिन वास्तविकता भी यही थी कि सिर्फ तारीख ही बदल रही थी शायद और कुछ नहीं। काश कुछ बदल पाता। जाते-जाते 2014 रो रहा था। चमकीली रोशनी के पीछे दर्द भरे आंसू थे। यह वही आंसू थे जो हजारों निर्दोषों और मासूमों का खून पी कर जन्मे थे। यह वही आंसू थे जो शायद कभी किसी की आंखों में नहीं आना आना चाहते थे। यह वही आंसू थे जो सूख जाना पसंद करेंगे।
जाते-जाते पिछला साल आने वाले साल को अपनी हकीकत से रूबरू करा रहा था। मानों उसे अपने बारे में सब कुछ बता देना चाहता था। उसे अच्छे-बुरे से परिचित करा देना चाहता था। उसे दुनिया की समझ करा देना चाहता था। ऐसा आभास हो रहा था जैसे एक पिता अपने बच्चे को आने वाले कल के बारे में समझा रहा हो, उसे दुनिया दारी से परिचित करा रहा हो। दुनिया से विदा लेने से पहले वह उसे अपना सर्वस्व उसके हवाले कर देना चाह रहा था। और उससे गुजारिश कर रहा था कि तुम वह गलती मत दोहराना जो मेरे समय में हुइ्र्र। इसी तरह 2014 आसमान में पटाखों की आवाज के साथ चीख-चीख कर 2015  से बोल रहा था कि यह देखो, यह जो निर्दोष तुम्हारे लिए जश्न मना रहे हैं इन्हे कभी निराश मत करना।
वह देखो जो छोटे-छोटे मासूम अपने घरों में इस वक्त अपनी मां के आंचल में सिर छिपा कर सोए हुए हैं, कल सुबह जब तुम्हारा दिन होगा वह ढ़ेर सारी खुशियों, उम्मीदों के साथ स्कूल जाएंगे। उनको उन्हें महफूज रखना । मेरी तरह, पेशावर में उन मासूमों की हत्या का कलंक तुम अपने सर पर मत लेना। उनको जीने देना। एक दिन वही इस दुनिया की हकीकत बदलेंगे। और वह देखों जो बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन , हवाई अड्डों पर जो लोग अपने घरों को जा रहे हैं, वह जो अपने सपनों को साकार करने जा रहे हैं, वह जो अपने प्रियतमों से मिलने जा रहे हैं, उनकी खुशी देखो, उनकी यह खुशी हमेशा बरकरार रखना। उन परिजनों को देखो जो अपनों  का इंतजार कर रहे हैं। उनके इंतजार को इंतजार ही मत रहने देना।
इसी तरह वह सारी रात तुम्हे यानि 2015 को समझाता रहा, देश-दुनिया से परिचित कराता रहा। इस बीच वह तुम्हे  सीरिया, इराक ले गया। वहां के लोगों का दर्द दिखाया। लंदन,न्यूयॉर्क ले गया। दिल्ली, पेरिस भी ले गया। मोदी-ओबामा से मिलवाया। कैलाश-मलाला से मिलवाया। अलकायदा, आइएस और तहरीक-ए-तालिबान से...! नहीं..नहीं.. इनसे नहीं मिलवा सकता। एक पिता अपने बच्चे को लफंगों की संगत में कभी नहीं देख सकता। रात भर यही सिलसिला चलता रहा। रात का घुप्प अंधेरा छंटने को था। सूरज की पहली किरण धरा पर अपनी छटा बिखेरने को आतुर थी। 2014 दम तोड़ चुका था और अगले ही छण में 2015 यानी कि तुम धरती में प्रवेश कर रहे थे। आते-आते तुमसे एक गुजारिश मेरी भी... याद रखना दुनिया बहुत बहकाऊ है, अच्छाई और बुराई से घिरी हुई है, उम्मीद है कि तुम नहीं बहकोगे। तुम अच्छाई का दामन थाम कर लोगों की जिंदगी में सुख,  चैन, अमन , शांति की बारिश कर दोगे। इसी उम्मीद के साथ अब हर सुबह होगी तुमसे मुलाकात और 365 दिन तक रहेगा तुम्हारा साथ। 

तुम्हारे अपने 
समस्त दुनिया वासी



Tuesday, December 30, 2014

धर्म के ठेकेदारों को खत्म करें


ज-कल 'पीके' फिल्म को लेकर तरह-तरह की बातें की जा रही हैं। कुछ लोग इसे हिंदू विरोधी भी बता रहे हैं तो कुछ इसकी सराहना भी कर रहे हैं। दरअसल बात विरोध या सराहना की नहीं है। भारत में धर्म और आस्था के नाम पर पाखंड की जड़ें इतनी गहराई तक समाई हुई हैं कि तने पर जरा सी चोट मात्र पर पेड़ तो तो जस का तस खड़ा रहता है, लेकिन पत्तों में गडग़ड़ाहट पैदा हो जाती हैं। हालांकि इस मुद्दे को बेवजह हवा दी जा रही है। 

दुनिया भर में मौजूद प्रत्येक धर्म कहता है कि ईश्वर एक है। जब ईश्वर एक है तो धर्म अनेक क्यों? भारत में धर्म के नाम पर लोगों की दुकानें खूब फल-फूल रही हैं। धर्म को लेकर सबके अपने अलग-अलग मायने हैं। सबकी अपनी मान्यताएं हैं और सभी धर्म और भगवान को अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हैं। कोई भगवान के नाम पर रोजी-रोटी कमा रहा है तो कोई जाति-धर्म के माध्यम से अपनी राजनीति चमका रहा है। लोग धर्म को व्यापार का जरिया बना रहे हैं। देश में भगवान के नाम पर लूटने वालों के कारनामे किसी से छिपे नहीं हैं। जाहिर है कि हम सबका मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च जाने के पीछे एक स्वार्थ निहित होता है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस भगवान से हम दोनों हाथ फैलाकर हमेशा कुछ न कुछ मांगते रहते हैं, उनको ही बेचारा समझ चंद सिक्के या एक अदद सा नोट दान-पात्र के हवाले कर देते हैं। वहीं चौराहे पर एक भीख मांगते लाचार को देख मुंह बिचका कर चल देते हैं।
सर से लेकर पांव तक हम मानते हैं कि भगवान ने इंसान की रचना की, लेकिन आज वही इंसान भगवान की रचना कर रहा है। इससे बड़ी विध्वंसक बात कुछ और हो ही नहीं सकती है। वास्तव में धर्म की परिभाषा से सभी अनजान हैं। धर्म के नाम पर आए दिन नए-नए पाखंड रचे जाते हैं। दुनिया भर में धर्म के नाम पर इंसान ही भगवान का सौदा करने पर आमदा है। गली-गली, चौराहे-चौराहे पर भगवान बिकाऊ हैं। भगवान और इंसान के बीच बिचौलियों का कब्जा हो गया है। जब-जब हम पर अंधविश्वास हावी होता है हम बिचौलियों का सहारा लेते हैं। धर्म के नाम पर दुकानें चल रही हैं। आसाराम, रामपाल इस बात के उदाहरण हैं। अगर हमको-आपको भगवान तक सीधा पहुंचना है तो धर्म के इन ठेकेदारों को खत्म करना होगा। 

Wednesday, December 24, 2014

प्रधान सेवक जी, जनता जवाब मांगे..

                               मोदी की हालत पीआर कंपनी के एजेंट सी हो गई है

ज कल दुनिया में हो हल्ला मचा हुआ है। एक ओर जहां दुनिया आतंकवाद से बिलख रही है वहीं भारत धर्मवाद से तड़प रहा है। अभी ऊबर कांड का जिन्न शांत नहीं हो पाया था कि देश में धर्मांतरण का मुद्दा बहस का मुद्दा बन गया। अचानक उपजे इस 'घर-वापसी' कार्यक्रम को लेकर जहां एक ओर विपक्षी दलों के नेता सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी की खामोशी बहुत कुछ बयां कर जाती है। इस पूरे प्रकरण पर मोदी ने शुरू से लेकर अब तक कोई सार्वजनिक खंडन नहीं किया है। इस शोर-शराबे के बीच सवा सौ करोड़ लोग मोदी को ताक रहे हैं लेकिन मोदी बगलें झांकते नजर आ रहे हैं। देश में धर्म के नाम पर हो रहे तांडव पर हिंदुस्तान की आवाम को जब मोदी की सख्त जरूरत है तब मोदी की ये खामोशी समझ से परे है। आम चुनावों के पहले रैलियों-मंचों से दहाड़ते मोदी के रूप में जनता को एक ऐसा शख्स नजर आ रहा था जो जाति, धर्म इत्यादि से परे विकास, एकजुटता, भाईचारे की बात कर रहा था। दशकों से चली आ रही जाति -धर्म की सियासत से ऊब चुके लोगों को मोदी में नई किरण दिखाई दे रही थी। ऊंचे- ऊंचे मंचों से माइक पर गरजते मोदी ने जनता को भरोसा दिलाया था कि वह सुशासन को देश के एजेंडे पर लाकर रख देंगे। लेकिन समय के साथ चुनाव से पहले किए गए सारे वादे कदम-दर-कदम खोखले साबित होते जा रहे हैं। चुनाव के पहले करोड़ों लोगों के लिए सुपरमैन का अवतार बन चुके मोदी की दशा इस समय एक पीआर कंपनी के एजेंट सी हो गई है। जो देश विदेश में घूम-घूम कर 'भारत ब्रांड' के लिए बिजनेस जुटा रहा है। मोदी के हाथों में सत्ता की बागडोर सौंपते समय जनता ने जिस 'सियास' से मुक्त होने का सपना देखा था, आज उन्हीं मोदी के प्रधानमंत्री रहते हुए देश में धर्मांतरण जैसा 'कृत्य' खुलेआम हो रहा है। सरकार की सह पर आरएसएस और विहिप देशभर में तथाकथित घर वापसी को सरेआम अंजाम दे रहे हैं। मोदी के इस छोटे से शासन काल में ही  'लव जिहाद', 'बहू बनाओ-बेटी बचा' और घर वापसी जैसे मामलों की फेहरिस्त मोदी को कठघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ती। मंत्रियों-सांसदों की भड़काऊ बयानबाजी से त्रस्त जनता को अब सिर्फ  देश के प्रधानमंत्री के जवाब का इंतजार है। ऐन मौके पर उनकी खामोशी अखरती है। 

Thursday, December 11, 2014

नियम-कानून नहीं मानसिकता बदलनी जरूरी है

आज से ठीक दो साल पहले 16 दिसंबर 2012 की रात की उस खौफनाक वारदात को शायद ही कोई भूला हो। चलती बस में मेडिकल की छात्रा से दुष्कर्म की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। हादसे के बाद गली मुहल्ले से लेकर संसद तक भूचाल आ गया था। महिला सुरक्षा को लेकर तमाम तरह के सवाल खड़े हुए। संसद से ही उनके समाधान भी खोज लिए गए। लेकिन उनके सड़कों पर आने की परवाह किसी को नहीं थी। लोगों ने बढ़-चढ़ कर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। ऐसा लग रहा था मानों रेप दरिंदों ने नहीं बल्कि सरकार ने किया हो। कड़ाके की सर्दी में पुलिस की लाठियों तथा पानी की बौछारों की चिंता न करते हुए हजारों की संख्या में लोग आरोपियों को सजा दिलाने दिल्ली की सड़कों पर उतरे। जगह-जगह कैंडल मार्च का अयोजन किया गया। सरकार ने प्रदर्शन कारियों की मांगों को संज्ञान में लिया। आज दो साल बाद फिर दिल्ली की सड़कों पर रेप की घटना ने तूल पकड़ा। निर्भया कांड के बाद नियम बदले, कानून बदला, सरकार बदली। और अब सवाल यह है कि लोग कितना बदले? वह लोग कितना बदले जो 2 साल पहले इंसाफ का मुखौटा पहन न्याय की मांग कर रहे थे। एक सवाल है उन सबसे जो लोग ठीक 2 साल पहले सड़कों पर पुलिस की लाठियों की परवाह न करते हुए, सड़कों पर मोमबत्ती लेकर घूम रहे थे, वह कितना बदले? क्या उन्होंने सड़क पर चलती लड़कियों/स्त्रियों को घूरना बंद कर दिया है। शाम को स्कूल-कॉलेज,कोचिंग अथवा ऑफिस से घर लौट रही लड़कियों पर फब्तियां कसना बंद कर दिया है? दिन भर शराफत का चोला पहन कर घूमने वाले लोग अंदर से कितने नंगे हैं इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि निर्भया कांड के दौरान 5 आरोपी बनाम पूरा देश था, लेकिन देश में महिलाएं अब भी सुरक्षित नहीं। घिनौनी वारदातों को अंजाम देने वाले दरिंदे आसमान से नहीं उतरते,इतर वह हम सबके बीच से ही होते हैं। इसके लिए  दोषी न सरकार है न कानून। दोषी हमारा समाज है। हम हैं। बस, टैक्सी बैन करने से कुछ नहीं होने वाला। अगर होता तो निर्भया कांड के बाद ऊबर कांड का अस्तित्व ही नहीं होता। अगर कुछ बदलना है तो हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी। यह भारतीय समाज ही है जहा पैदा होते ही बेटों को नकली तमंचा और बेटी को गुडिय़ा पकड़ाई जाती है।

Wednesday, December 10, 2014

खयालों में गुम


(जनसत्ता में 12 दिसंबर 2014 को प्रकाशित असंपादित लेख।जनसत्ता की वेबसाईट पर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें अथवा जनसत्ता के ई—पेपर में पढ़ने के यहां क्लिक करें )

भी-कभी सड़क पर चलते-चलते खयाल आता है और खयालों में ही पूरा महल खड़ा हो जाता है। उन खयालों में इतना डूब जाता हूं कि आगे की सुध ही नहीं रहती। असली मंजिल भूल कर धरातल तक पहुंचने का सिलसिला शुरू ही होता है कि व्यवस्था की शक्ल में पत्थर से टकरा कर एक झटके में खयालों का वह महल चूर हो जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है? यह समझने के लिए निगाहें किसी को खोजती फिरती हैं। फिर खयाल आता है कि मेरी ही तरह अन्य भी इस नीरस भौतिकता में जी रहे हैं। कई दफा उचित व्यक्ति के पास पहुंच कर भी ठहर जाता हूं। फिर अपने खयालों का पुलिंदा अंदर ही समेट कर छटपटा कर रह जाता हूं। आखिर हम लोग क्यों जी रहे हैं? एक बार यह सवाल सुन कर कोई भी कुछ क्षण के लिए सोचने को मजबूर हो सकता है। उस रात लेटे-लेटे मैंने खुद से यह सवाल किया तो जवाब ढूंढ़ते हुए रात कब गुजर गई, पता ही नहीं चला।
भौतिकता के भय में अवसाद से जूझने का सिलसिला शुरू हो गया। न चाहते हुए भी जवाब का खयाल छोड़ कर भौतिकता की अंधी भाग-दौड़ में शामिल होने की तैयारी करने लगा। पेट की भूख और जीने की जरूरत ने इंसान से उसका समय चुरा लिया है। खुद के बारे में उसे सोचने का वक्त नहीं मिल पाता। जिंदगी भर कोई भाग-भाग कर घर पर अपने पीछे पल रहे प्राणियों के लिए दाने-पानी का इंतजाम करता है तो किसी के पास सालों-साल या फिर दशकों के दाने-पानी का इंतजाम होते हुए भी वह न जाने किस मंजिल पर पहुंचने की होड़ में है। इस सवाल का जवाब शायद उनके पास भी नहीं होगा।
दिन भर की जद्दोजहद के बाद शाम को घर लौटते समय फिर से खयालों का सिलसिला शुरू हो जाता है।
यह सिलसिला यों ही भौतिकता से शुरू होकर भौतिकता पर आकर ठहर जाता है। निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले ही फिर सवालों के घेरे में उलझ जाता हूं। जिंदगी घड़ी की सुइयों में सिमट गई है, जिनके इशारे पर दिन भर चकरघिन्नी बने फिरते हैं और बेसब्री से वक्त के ठहरने का इंतजार करते हैं। रोजाना बिस्तर पर जाकर एकबारगी वक्त के ठहर जाने का अहसास होता है। लेकिन अहसास के हकीकत में बदलने से पहले ही वह महज मृग-मरीचिका साबित होता है। अगली सुबह हम फिर घड़ी की सुइयों के इशारे पर नाचने के लिए खुद को तैयार करने के लिए जुट जाते हैं। इस बीच जो नींद आती है, उसे नींद का नाम दिया जाए या फिर अगले दिन के लिए खुद को फिर से तैयार करने का जरूरी खुराक। इस फेर में अक्सर हम असल जिंदगी के जरूरी खुराक लेना भूल जाते हैं। जिंदगी के कुछ पन्ने पलट जाने के बाद हमें इस बात का आभास होता है। तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
इस भागमभाग-सी जिंदगी के बीच हम न जाने किससे आगे जाने की होड़ में रहते हैं और पीछे छूट जाता है हमारा सुख-चैन और यथार्थ। थक-हार कर जब हम पीछे मुड़ कर देखते हैं तो बचपन से लेकर पचपन तक हमने जो सपने संजोए थे, सभी बिखरे हुए नजर आते हैं। चाह कर भी हम भागना नहीं छोड़ पाते, क्योंकि पैदा होते ही हमें चलना सिखाया जाने लगता है। जिंदगी की इस भाग-दौड़ में हम अनेक मुकाम हासिल करके भी न जाने खुद को, रिश्तों, मूल्यों और यहां तक कि अपने गांव और देश को भी कितना पीछे छोड़ आते हैं। लेकिन इतना आगे आकर भी हम कहीं नहीं पहुंच पाते हैं। जिंदगी के अंतिम दिनों में सुकून ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं। हासिल कुछ नहीं! ज्यादा से ज्यादा नए किरदार में जिंदगी का वही सिलसिला!
- See more at: http://www.jansatta.com/columns/editorial-lost-in-deep-thought/8790/#sthash.0udn3cvi.dpuf

Thursday, November 6, 2014

कमरे से बाहर आना होगा कानून को


पिछले दिनों ईरान में एक 26 वर्षीय युवती रेहाना जब्बारी को एक अदालत के आदेश पर फांसी पर लटका दिया जाता है। उसका गुनाह मात्र इतना था कि उम्र के 19वें पड़ाव पर उसने बलात्कार का प्रयास करने वाले एक शख्स को चाकू घोंप कर मौत के घाट उतार दिया था। वह शख्स मुर्तजा अब्दोआली  सरबंदी ईरानी खुफिया विभाग में कार्यरत था। रेहाना को खुद की आबरू की हिफाजत की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी।

ईरानी अदालत ने दुर्दांत कानून का नमूना देते हुए रेहाना को फांसी पर लटका दिया। पिछले सात सालों से इस गुनाह की सजा काट रही रेहाना की कानून ने एक न सुनी। अंतराष्ट्रीय दबावों व विश्व भर के मानवाधिकार संगठनों के तमाम प्रयासों व सोशल मीडिया पर चल रहे कैंपेनों के बावजूद भी उसको बचाया नहीं जा सका। रेहाना की फांसी रोकने के लिए मानवाधिकार संगठनों ने मोर्चा खोला जिससे कुछ समय के लिए फांसी टाल दी गई थी। हालांकि रेहाना ने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए न कोई दलील दी बल्कि न ही उसने कोर्ट में चीखना,चिल्लाना व गिड़गिड़ाना मुनासिब समझा। शायद उसे अपने देश के न्याय पर भरोसा था। 


रेहाना की फांसी के ठीक दो दिन बाद इस्लामिक इस्टेट ने एक कुर्दिश महिला का सिर कलम कर दिया था। संयोग से उसका नाम भी रेहाना था, उसने करीब 100 आईएस आतंकियों को मार गिराया था। उसके इस गुनाह की सजा आईएस ने उसका सर कलम कर के दी।  अगर इन दोनों मामलों में देखा जाए तो आईएस और ईरान के कानून में ज्यादा कोई फर्क  नजर नहीं आता। बस फर्क इतना है कि आईएस ने सजा देने में ज्यादा वक्त नहीं लिया जबकि ईरान को सजा देने में 7 साल लग गए। सरबंदी की हत्या के जुर्म में 2007 में गिरफ्तार रेहाना जब्बारी ने जेल से अपनी मां को संबोधित एक पत्र लिखा, जिसे उसकी फांसी के एक दिन बाद जारी किया गया । पत्र में लिखी गई बातें लोगों को रह—रह कर चुभती रहेंगी। अपने जीते जी उसने  इंसाफ की जो जंग शुरू की थी, उसकी जिम्मेदारी अब कौम के कंधों पर है।


इस पूरे वाकये को याद कर 2011 में आई पाकिस्तानी फिल्म बोल की धुंधली पड़ती यादें फिर से ताजा हो गईं। इस फिल्म में  पाकिस्तानी अदालत एक ऐसी लड़की को सजा-ए-मौत देती है जो अपने पिता के गुनाहों से आजिज आकर एक दिन उनकी हत्या कर देती है। पुत्र की चाहत की कामना करे वाले उसके पिता की चौदहवीं संतान लड़के और लड़की के बीच की होती है।  जिसके जवानी के दिनों में वह उसकी हत्या कर देता है। इस फिल्म ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया था। 

लाहौर की रहने वाली लड़की जुनैब पर उसके अपने पिता को मार डालने का आरोप होता है। जुनैब ने आज तक किसी भी अदालत में कोई बयान नहीं दिया। अंत में उसका मामला पाकिस्तान के वजीर-ए-आज़म के पास पहुँचता है। यह समझ कर कि उसने आजतक उसने अपने बचाव में कुछ नहीं कहा, इसलिए वह वाकई में आरोपी है, आज़म उसकी मौत की सजा पर मुहर लगा देते हैं। पर आखिर में फांसी के फंदा चूमने से पहले उसने मीडिया के सामने अपनी कहानी सुनाने की इच्छा व्यक्त की। इस कहानी में उसने पाकिस्तानी  औरतों पर हो रहे अत्याचारों और जुल्मों की वह दर्दनाक कथा बयां की,जो कि शायद इसके पहले कभी की गई हो। वह बिना किसी मलाल के फांसी के फंदे को चूम कर हमेशा के लिए सो गई, लेकिन पूरी दुनिया को गहरी नींद से जगा गई।


इन दोनों रील और रियल लाइफ के अदालती मामलों में मुस्लिम देशों के कानून की निर्जीविता की झलक साफ दिखलाई देती है। कानून कब तक अंधा न्याय करता रहेगा। लीक से हटकर कानून को पुन: संशोधित करने की जरूरत है। समय के साथ-साथ अपराधों की किस्मों में भी बदलाव हुआ है, मगर कानून पुराने ढर्रे पर अडिग है। कानून को बदलाव के लिए अदालती कमरे से बाहर निकल वास्तविकता को अपनाना होगा। नहीं तो वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब कानून और आईएस सरीखे संगठनों के बीच की खाई पट जाएगी। 

Monday, November 3, 2014

दावे नहीं दवा चाहिए साहेब

उत्तर प्रदेश सरकार लाख दावे कर ले, मगर प्रदेश में किसानों  की हालत जग-जाहिर है। गाहे-बगाहे किसानों के साथ अत्याचार की घटनाएं सामने आती रहती हैं।त्तर प्रदेश में किसानों की बदतरी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है पिछले दिनों एक किसान ने लोन की राशि न अदा कर पाने के कारण आत्महत्या कर ली। छह बीघे जमीन के मालिक अशोक कुमार ने करीब सात साल पहले किसान क्रेडिट कार्ड स्कीम के तहत बैंक से 50 हजार का लोन लिया था। न चुका पाने की हालत में जो बाद में बढ़ कर 95 हजार का हो गया। इसी तरह अशोक ने अन्य जगहों से भी लोन ले रखा था। लेकिन चुकाने में असमर्थ होने के कारण उसने मौत को गले लगाना ज्यादा मुनासिब समझा। इसी तरह कुछ दिनों पहले एक और मामला सामने आया था जिसमें 28 बीघे जमीन के मालिक गन्ना किसान राहुल कर्ज का बोझ नहीं सहन कर सका और मौत को गले लगा लिया। आकड़े उठाकर देखें तो किसानों की बदहाली को बयां करने वाली ऐसी अनेकों घटनाएं मिल जाएगी। जिसमे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों की पीड़ा किसी से नहीं छुपी है। अगर फिर भी राज्य सरकार किसानों की बहाली का दावा कर रही है तो यह समझ से परे है।
आलम यह है कि सरकार योजनाएं बनाती है और धरा पर आते-आते इन योजनाओं की दम निकल जाती है। सारी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। असल में योजनाए किसानों के लिए नहीं बल्कि सरकार से किसान के बीच बैठे माफियाओं के लिए बनती हैं। प्रदेश में अन्य राज्यों की अपेक्षा पर्याप्त कृषि भूमि होने के बावजूद भी यहां की सूरत बदहाल है। बड़ी-बड़ी महत्चकांछी योजनाएं बन कर भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है। सरकार ने सिंचाई संसाधनों की दुरस्तगी के लिए समर्सिबल बोरिंग के लिए अनुदान की व्यवस्था शुरू की थी। इस योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को अधिकारियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। जिसमें अनुदान से मिलने वाला आधा धन भ्रष्टाचार के नामे हो जाता है। बोरिंग के बाद बिजली कनेक्श मिल जाना भी बड़े भाग्य की बात होती है। स्थान के मुताबिक 1 लाख रुपए से लेकर 3 लाख तक की घूस देने के बावजूद भी किसानों को अधिकारियों के नखरे सहने पड़ते है।

भ्रष्टाचारगी का आलम यह है कि किसानों को बीज खरीदने से लेकर गल्ला बेंचने तक हर जगह भ्रष्टाचार का शिकार होना पड़ता है। उन्नत बीज उपलब्ध कराने वाली सहकारी समितियां तय कीमत से डेढ़ से दो गुना ज्यादा कीमत वसूलती है। यही हाल उर्वरकों में भी है। नहर, बम्बा आदि में समय से पानी न आने पर किसानों को मंहगी दरों पर निजी ट्यूबवेल से सिंचाई करवानी पड़ती है। खून-पसीने की मेहनत के बााद जब फसल लहलहा कर होती है तो बाजार भाव देखकर किसानों का चेहरा खिलने के पहले ही मुरझा जाता। वहीं किसानों से समर्थन मूल्य पर गल्ला खरीदने का दावा करने वाली सरकार द्वारा निर्धारित सहकारी समितियां अनाज खरीदने से मना कर देती हैं। अगर खरीदती भी हैं तो किसानों को अपनी बारी का इंतजार करते-करते तीन-तीन दिन तक क्रय केंद्र के बाहर धूप-पानी में डेरा डाल कर पड़े रहना होता है। इन सबके बावजूद भी अगर गल्ला बिक गया तो भुगतान के समय निश्चित कोई न कोई बाधा या कम भुगतान करने की शिकायतें आम हैं। वहीं गन्ना किसानों के हालात पर चर्चा करें तो मौजूदा गणना के मुताबिक यूपी की चीनी मिलों पर गन्ना किसानों का करीब 5000 करोड़ का बकाया है।

Sunday, November 2, 2014

श्रृद्धा पर भारी रसूख

प्रभु के दरबार में न कोई ऊंच-नीच होती है और न ही कोई छोटा-बड़ा होता है। ऐसा पुराणों में लिखा है और वह सिर्फ लिखा ही रहेगा। पिछले दिनों एक सज्जन ने इस बात को लेकर गहरा रोष व्यक्त किया था। उनकी बात में भी दम था और सच्चाई थी। लेकिन तब तक यह चर्चा का विषय नहीं था। लेकिन देश के सबसे धनी व्यक्ति मुकेश अंबानी और उनकी पत्नी के बनारस के काशी विश्वनाथ मंदिर में पंहुचने के साथ इस मुद्दे ने तूल पकडऩा शुरू कर दिया।

देश-विदेश, सैकड़ो किलोमीटर से गंगा के पावन तट पर बसी पावन नगरी में भगवान काशी विश्वनाथ के दर्शन की कामना लिए चले आ रहे श्रृद्धालुओं को भगवान के दर से बिना दर्शन के ही लौटना पड़ा। 60 साल से चली आ रही आरती की परंपरा को एक झटके में टूट गई। जिसकी वजह बने मुकेश अंबानी और उनकी पत्नी नीता अंबानी। मिसेज अंबानी का जन्म दिन मनाने बनारस पहुंचे अंबानी परिवार के लिए भगवान को बेंच दिया गया। आखिर कब तक दिखावा करने वाले वीवीआईपीओं के लिए आम जनता को ठोकरें खानी पड़ेंगी। दुनिया की सारी सुख-सुविधाओं के साथ अब धर्म भी अमीरों का हो चला है।

पत्थर की मूर्ति का सौदा करते-करते आस्था भी बिकाऊ हो गई है। आलम यह है कि आपकी जेब में जितना माल, मंदिर में आपका उतना ही भौकाल। यह नजारा आम तौर हिंदू धर्म के अधिकतर मंदिरों में  देखने  को मिल जाता है। भगवान के दर पर खड़ा होकर  इंसान, इंसान से ही भगवान का सौदा कर रहा है। भगवान के रचे हुए इंसान का जमीर इतना गिर चुका होगा इसकी कल्पना भगवान ने इंसान को रचते वक्त भी नहीं की होगी।

जिस देश का प्रधनामंत्री खुद को चाय बेचने वाला बताता हो, उस देश में तो कम से ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती। खास तौर पर मोदी के लोकसभा क्षेत्र में तो किसी ने ऐसी कल्पना भी नहीं की होगी। लेकिन कल्पना और हकीकत इस बार एक दूसरे के विपरीत खड़े हैं। कुछ दिनों पहले मीडिया में एक खबर चली थी कि एक युवक को पासपोर्ट ऑफिस से परेशान किए जाने पर उसने मोदी को चिट्ठी लिखी थी। मोदी ने इस पर तुर्त कार्यवाई की थी, और युवक को अगले एक हफ्ते के अंदर ही पासपोर्ट जारी कर दिया गया था। तब ऐसा लगा मानो अच्छे दिन सच में आ गए हैं। लेकिन अंबानी के लिए साधुओं-श्रृद्धालुओं को मंदिर परिसर से भगा देना कहां से अच्छे दिनों की ओर संकेत करता है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी तक भी यह बात पंहुंची होगी। अब देखना यह है कि मोदी क्या कार्यवाई करते हैं? या यूं ही अमीरों के हाथों सत्ता का सौदा करते रहेंगे।

Thursday, October 2, 2014

मोदी, झाडू और गंदगी

      ड्रामा और हकीकत एक सिक्के के दो पहलू हैं।  आज दोनो ही सामने  आ गए। अपने आप को प्रधान सेवक बताने वाले मोदी जी ने सड़क के सूखे पत्ते साफ कर सफाई अभियान की शुरूआत की वहीं खुद को आम आदमी बताने वाले केजरीवाल ने गंदी बजबजाती नालियों को साफ किया। अब ​किसने हकीकत में किया किसने ड्रामा यह तो भगवान जानता है या तो फिर वह खुद। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं की इस सफाई अ​भियान के पीछे स्वार्थ निहित है। कुल मिला कर आज मोदी,झाडू और  गंदगी के बीच कोई रिश्ता नजर नहीं आया।

     
​जिस तरह से मोदी ने सफाई ​अभियान कार्यक्रम को अंजाम दिया वह तो महज एक ढोंग था। पहली बात तो कोई सज—धज कर व नए स्त्री किए हुए कपड़े पहन कर तो अपने घर पर भी झाडू नहीं लगाता,रोड में लगाना तो दूर की बात है। और दूसरी बात मीडिया को हफ्तों पहले से सूचित करना कार्यक्रम को प्री—प्लान्ड ड्रामा बनाता है, आज—कल तो कोई सफाई कर्मचारी भी किसी को बता कर झाडू नहीं लगाने जाता । और तीसरी बात रही मीडिया के समाने व सज धज कर कार से आना और फिर झाडू लगाना,लोगो को तो पड़ोसी भी घर के बाहर झाडू लगाते देख लेते हैं तो वह झेंप जाते हैं। इन सब पर गौर करें तो मालूम चलता है कि मोदी का सफाई अभियान कम ईवेंट ज्यादा था।

    
अगर मोदी को कुछ साफ ही करना था तो पीएम आवास अथवा संसद भवन में एक दिन के लिए सफाई कर्मचारियों की छुट्टी कर देते और थाम लेते झाडू। अगर इतने से भी पेट न भरता तो निकल पड़ते दिल्ली की गलियों में वहां काफी कुछ था साफ करने को। खैर जो हुआ सो हुआ। अभी भी मोदी जी एक काम और कर सकते हैं,रोजाना अपना बेडरूम ही साफ कर लिया करें वही बहुत है। और रही केजरीवाल की बात तो उनके बारे में कुछ कहने की जरूरत नहीं है,ये पब्लिक है कि सब जानती है। मोदी के इस सफाई अभियान कम ईवेंट के दौरान प्रशंसकों को आटोग्राफ देना कहां तक उ​चित था। भला क्या कोई सफाई वाला आटोग्राफ देता है ? मोदी जी जनता को उल्लू न बनाविंग......

                                                                                                       08109555764/09455879256